July 15, 2024

डॉ. शुचि चौहान

आज कोरोना के विरुद्ध सब युद्धरत हैं. कोई फ्रंटलाइन पर तो कोई बैकलाइन पर अपनी तरह से इस लड़ाई में अपना योगदान दे रहा है. लॉकडाउन में आवश्यक सेवाओं जैसे चिकित्सा, सुरक्षा, पेयजल, बिजली, बैंक व प्रशासनिक कार्यों को छोड़कर सब कुछ बंद है. ऐसे में इन क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाओं की तो जैसे अग्निपरीक्षा है. घर में छोटे-छोटे बच्चे, बीमार या बुजुर्ग माता पिता, जिन्हें पल पल देखभाल की जरूरत है, उन्हें छोड़कर वह अपनी ड्यूटी कर रही हैं. चिकित्सा व सुरक्षाकर्मी तो कई कई सप्ताह अपने घर भी नहीं जा पा रहीं. लेकिन वे पूरे समर्पण व मनोयोग से देश को अपनी सेवाएं दे रही हैं. कई कई बार तो ऐसे दृश्य सामने आ जाते हैं, जब आसपास के लोग भी अपने आंसू नहीं रोक पाते.

पिछले दिनों ऐसा ही एक दृश्य सामने आया बेलगावी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में कार्यरत सुनंदा 15 दिन से घर नहीं जा पाई थीं, तीन साल की बेटी घर पर मां के पास जाने की जिद कर रही थी, दो-तीन दिन तो सुनंदा के पति बहलाते रहे, लेकिन छोटी बच्ची के समक्ष मजबूर हो सुनंदा से मिलाने अस्पताल लेकर आए. बेटी मां को देखकर मां…मां….पुकार कर बिलख रही थी और पिता की गोदी से उतर कर मां से लिपटने को तत्पर थी. लेकिन सुनंदा संकट काल में अपने कर्तव्य के चलते अपनी बेटी को गले नहीं लगा पा रही थी, निरंतर आंसू बह रहे थे….वह आंसू पोंछते हुए बेटी को वापस घर ले जाने के पति को इशारा भर कर पा रही थीं. यह देखकर हर किसी की आंखें नम थीं.

ऐसा ही एक और दृश्य सामने आया छिंदवाड़ा के एक अस्पताल में. पूनम भायदे यहां नर्स हैं, उनकी भी कोरोना संक्रमितों की देखभाल के लिए अस्पताल में ड्यूटी लगी. वह अपनी चौदह माह की बेटी से चालीस दिन से नहीं मिलीं. वीडियो कॉल करने पर रोती हुई बेटी जब कहती है मम्मी पापा ने कहा है, जब मम्मी से बात हो तो कहना मैं ठीक हूं, मम्मी मैं ठीक हूं…, तुम घर कब आओगी? – सुनकर पूनम की आंखें छलकने लगती हैं. पूनम के साथ बैठा मेडिकल स्टाफ भी भावुक हो जाता है.

जयपुर की सुनीता और नाथी सुभाष चौक थाने में कांस्टेबल हैं. वे ड्यूटी करने के साथ ही जब भी समय मिलता है, थाने में रखी मशीन से मास्क सिलती हैं और फील्ड में जाने पर जरूरतमंदों को बांट देती हैं.

देशभर में और भी ऐसे अनगिनत दृष्टांत हैं. फ्रंटलाइन पर तैनात मातृशक्ति ने संकट काल में कर्तव्य को सर्वोपरि माना है, तो बैक लाइन पर तैनात मातृशक्ति ने भी जंग में संबल प्रदान किया है.

ये वे महिलाएं हैं जो घर से बाहर रहकर फ्रंट फुट पर कोरोना से दो-दो हाथ कर रही हैं. लेकिन अनेक महिलाएं घरों में रहकर भी इस लड़ाई में पीछे नहीं. संघ के स्वयंसेवक परिवारों में तो यह आम है. जब घर के पुरुष राजमार्गों व वंचित समाज की बस्तियों में श्रमिकों व जरूरतमंदों के लिए कभी राशन सामग्री तो कभी भोजन पैकेट, कभी मास्क तो कभी पदवेश बांटने जाते हैं, तब वे घरों में इनकी व्यवस्था सम्भालती हैं. पूरा परिवार राशन व भोजन के पैकेट बनाने में सहायता करता है. कई परिवारों की महिलाएं घर का काम समाप्त होते ही मास्क सिलने बैठ जाती हैं.

राजस्थान के सरदारशहर में सेवाभारती की प्रेरणा से 300 परिवारों की मातृशक्ति ने एक ही दिन में, 19 अप्रैल रविवार को 10,000 मास्क सिले. जयपुर की 80 वर्षीया माया शर्मा अब तक 800 मास्क सिलकर बंटवा चुकी हैं. उनकी मशीन में धागा डालने का काम उनकी पोती काव्या करती है.

मास्क व भोजन पैकेट के अलावा ये महिलाएं शरीर में प्रतिरक्षण क्षमता बढ़ाने वाला काढ़ा तैयार कर लोगों में बांट रही हैं, पशु पक्षियों को चारा व दाना खिलाने से लेकर उनके पीने के पानी व पक्षियों के लिए परिंडों की व्यवस्था भी कर रही हैं. इन व्यवस्थाओं के लिए धन जुटाने का काम भी आपसी सहयोग से हो रहा है. माया ने जब मास्क सिलना शुरू किया, तब उनके पास 5 मीटर कपड़ा था, जिससे उन्होंने 100 मास्क बनाए और बस्ती में बांट दिए. इससे अन्य लोगों को प्रेरणा मिली और उन्होंने अपने अपने हिसाब से माया को मास्क सिलने के लिए कपड़े लाकर दिए.

अनेक लोग अपनी सामर्थ्यानुसार कुछ न कुछ तो इस यज्ञ में आहुति के तौर पर देना चाहते हैं. मैसूर के रघु राघवेंद्र एक 70 वर्षीय वृद्धा कमलम्मा के बारे में बताते हैं – 12 मई की बात है, मैसूर में कुछ कार्यकर्ता जरूरतमंद लोगों को भोजन सामग्री व अन्य आवश्यकता की चीजें बांट रहे थे. वहीं पर एक 70 वर्षीया वृद्धा खड़ी थीं. जब एक कार्यकर्ता ने उन्हें भोजन पैकेट देना चाहा तो उन्होंने विनम्रता से मनाकर दिया और बहुत ही झिझकते हुए अपनी साड़ी के पल्लू से बंधे 500 रुपए कार्यकर्ताओं को देते हुए बोलीं ये मेरी ओर से …. आप लोगों को 30 दिनों से इस क्षेत्र में सेवाकार्य करते हुए देख रही हूं तो मुझे लगा मैं भी अपना कुछ योगदान दूं. मेरी 600 रुपए पेंशन में से ये 500 रुपए हैं…. कार्यकर्ता नि:शब्द थे. इतना बड़ा दान… कुल मासिक कमाई का 85 प्रतिशत हिस्सा…. …और सबसे बड़ी बात यह दान उन्होंने लगभग मुंह छिपाते हुए, हाथ जोड़कर, कोई पब्लिसिटी न हो की मनुहार के साथ दिया.

उत्तराखंड निवासी वीरांगना 80 वर्षीय दर्शनी देवी ने संकट काल में जरूरतमंदों की सहायता की ठानी, तो पीएम केयर्स में दान देने के लिये 10 किमी का सफर पैदल तय किया और अपनी जमा पूंजी से पीएम केयर्स के नाम दो लाख रुपये का ड्राफ्ट बनवाकर प्रशासन को सौंपा.

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले की एक महिला काली दीदी ने पीएम केयर्स में 5 हजार रुपये की सहायता राशि दान की. यहां महत्व राशि का नहीं, भावना का है. काली दीदी के पास ये धनराशि केवल सिक्कों में थी, जिसे उन्होंने भीख मांग कर जमा किया था. काली दीदी रुद्रप्रयाग जिले के गुप्तकाशी में रहती हैं.

जम्मू निवासी खालिदा बेगम ने हज के लिये पांच लाख रुपये की राशि जमा की थी, कोरोना के कारण हज पर नहीं जा सकीं तो जरूरतमंदों की सहायता के लिए समस्त राशि सेवा भारती को दान कर दी.

मायलैब में किट तैयार करने वाली टीम की प्रमुख वैज्ञानिक मीनल भोंसले ने गर्भावस्था के अंतिम दिनों तक लगातार काम किया. बेटी को जन्म देने से महज एक दिन पहले 18 मार्च को उन्होंने मूल्यांकन के लिए किट नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) को सौंपी. उसी शाम अस्पताल में भर्ती होने से पूर्व व्यवसायिक अनुमति के लिए फूड एंड ड्रग्स कंट्रोल अथॉरिटी (सीडीएससीओ) के पास भी प्रस्ताव भेजा. मीनल कहती हैं, ‘इमरजेंसी थी. इसलिए इसे चुनौती के रूप में लिया. मुझे भी अपने देश की सेवा करनी है’

दूसरी ओर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की पत्नी सविता कोविंद कोरोना के खिलाफ जारी जंग में सहयोग किया. मास्क की कमी को दूर करने में अपना योगदान देते हुए वह स्वयं मास्क सिलकर बंटवाए.

एकल अभियान के तहत देशभर में कार्यरत शिक्षिकाओं, सिलाई केंद्रों में प्रशिक्षण ले रही बहनों ने जनजागरण के साथ ही 20 लाख से अधिक मास्क वितरित किये. देशभर में करीब दस लाख आशा कर्मी हैं, इन आशा कर्मियों ने स्क्रीनिंग में सहयोग के साथ ही फ्रंटलाइन पर रहकर कार्य किया. स्वास्थ्य, पुलिस, स्वच्छता, गृहणी, सामाजिक कार्यकर्ता प्रत्येक क्षेत्र से मातृशक्ति जंग में सहयोग कर रही है.

देखा जाए तो यही असली भारत है. जहां परमार्थ को जीवन से ऊपर माना गया है. कर्तव्य, दान, त्याग और बलिदान की कहानियां यहां के कण कण में विद्यमान हैं. कोविड19 महामारी के दौर में मानवता ने सामाजिक विषमताओं को भी हरा दिया है. कमलम्मा किसी भी तरह की सहायता लेने के बजाय सहायता कर रही हैं. देश की प्रथम महिला सविता कोविंद बाजार से मास्क खरीदकर गरीबों को बांटने की बजाय अपने हाथों से सिलकर लोगों को बांट रही हैं. ये संस्कार हैं जो निश्चित ही सनातन संस्कृति की पहचान हैं.

मीनल भोंसले की कहानी – मातृशक्ति को प्रणाम – पहले कोरोना टेस्ट किट तैयार की, फिर बेटी को जन्म दिया

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