
– सौरभ कुमार
सुशांत सिंह राजपूत की मौत ने एक सवाल हम सबके बीच छोड़ा है? क्या सफलता का मतलब ही ख़ुशी है? क्या जिन्होंने मंजिल पा ली है वो मुस्कुरा रहे हैं? इस दौड़ भाग भरी जिंदगी में हम इतने रम गए हैं कि एक बार रुक कर सोचने का वक़्त हमारे पास नहीं है। समाज और परिवार की अपेक्षाएं और अपने खुद के सपने हमें अक्सर बोझ से लगने लगते हैं और उसके बाद धीरे धीरे कब ये बोझ अवसाद में बदल जाता है हमें पता भी नहीं चलता। आज मानसिक समस्याएं भारत में एक बड़ी समस्या है लेकिन क्या हम भारतीय इसे पहचान रहे हैं?
डिप्रेशन अक्सर ऐसी मुस्कराहट का लबादा ओढ़े होती है। एक व्यक्ति जो अपने गम से घुटके अपनी जान दे सकता है, वो भीड़ के सामने इस तरह मुस्कुरा भी सकता है। आप नहीं जानते कि कौन कब किस समस्या से गुजर रहा है। सुशांत की इस मुस्कराहट के बहाने जरा रुकिए और सोचिये, कि कितना अच्छा होता अगर किसी ने सुशांत से अकेले में बैठकर पुछा होता। अगर कोई उस मुस्कराहट के पार देख पाया होता।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के मुताबिक 7.5 प्रतिशत भारतीय आबादी किसी न किसी रूप में मानसिक विकार से ग्रस्त है। मानसिक बीमारियां सभी स्वास्थ्य संबंधी मामलों का छठा हिस्सा हैं। मानसिक बीमारियों की व्यापकता और उपचार प्राप्त करने वाले रोगियों के अनुपात को ट्रीटमेंट गैप कहते हैं, भारत में यह 70 प्रतिशत से अधिक है। मतलब की मानसिक विकार से पीड़ित 70 प्रतिशत लोगों को इलाज नहीं मिल पाता। डब्ल्यूएचओ की भविष्यवाणी थी की 2020 तक भारत की 20 प्रतिशत आबादी मानसिक विकारों से ग्रसित होगी।
ये लोग कहीं जंगल या गुफाओं में नहीं हैं, हमारे और आपके बीच बैठे हैं, मुस्कुरा रहे हैं। उसके बावजूद हम भारतीय आज तक अवसाद को समझ ही नहीं पाए हैं। हाल ही के एक अध्ययन में मानसिक स्वास्थ्य के प्रति लोगों के नज़रिए का आकलन किया गया और उनसे पूछा गया कि, आप मानसिक बीमारी वाले व्यक्ति का वर्णन कैसे करेंगे? 56% ने कहा कि जो खुद से बात करता है; 9% ने कहा उदास; 15% ने उन्हें रिटार्ड कहा; 20% के मुताबिक उन्हें बेवकूफ / पागल कहा जाता है और यही हमारे व्यवहार में भी झलकता है। इस व्यवहार से रोगी शर्म, पीड़ा और अलगाव के दुष्चक्र में फंस जाते हैं। साथ ही, भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों की गंभीर कमी है। WHO के अनुसार, 2011 में, भारत में मानसिक स्वास्थ्य विकार से पीड़ित प्रत्येक 100,000 रोगियों के लिए 0·301 मनोचिकित्सक और 0·047 मनोवैज्ञानिक थे। भारत की 20 प्रतिशत आबादी इस समस्या से लद रही है और उनकी सहायता के लिए मात्र 4000 प्रोफेशनल्स मौजूद हैं।
यह समझने की जरुरत है कि जब तक हम मानसिक समस्याओं को सामान्य मानकर सहज नहीं हो जायेंगे तब तक अवसाद ग्रस्त लोग स्वीकार करने से भी घबराएंगे। अपने आसपास के लोगों के प्रति संवेदनशील बनिए, अपने दोस्तों से, चाहने वालों से समय-समय पर पूछते रहिये कि सब ठीक तो है न? कहीं भी संदेह लगे, कोई ज्यादा अवसाद में लगे तो उसकी स्थिति समझने की कोशिश कीजिये – और इसलिए नहीं कि आप जज करें। इसलिए ताकि आप किसी को मजबूत बना सकें।
